Wednesday, February 22, 2017

Dhiru Bhai Ambani

Dhiru Bhai Ambani 

Born-  28 December 1932 Chorvad, Gujarat, India
Born Died- 6 July 2002 (aged 69) MumbaiMaharashtra, India
Nationality- Indian
Occupation- Founder of Reliance Industries, Founder of Reliance Power, Founder of Reliance Capital
Spouse(s)- Kokilaben Ambani
Children- Mukesh Ambani, Anil Ambani, Neena Kothari, Deepti Salgaonkar
Awards- Padma Vibhushan (2016)

Dhiru Bhai Ambani built India's largest private sector company. Created an equity cult in the Indian capital market. Reliance is the first Indian company to feature in Forbes 500 list Dhirubhai Ambani was the most enterprising Indian entrepreneur. His life journey is reminiscent of the rags to riches story. He is remembered as the one who rewrote Indian corporate history and built a truly global corporate group. 
Dhirubhai Ambani alias Dhirajlal Hirachand Ambani was born on December 28, 1932, at Chorwad, Gujarat, into a Modh family. His father was a school teacher. Dhirubhai Ambani started his entrepreneurial career by selling "bhajias" to pilgrims in Mount Girnar over the weekends. After doing his matriculation at the age of 16, Dhirubhai moved to Aden, Yemen. He worked there as a gas-station attendant, and as a clerk in an oil company. He returned to India in 1958 with Rs 50,000 and set up a textile trading company. Assisted by his two sons, Mukesh and Anil, Dhiru Bhai Ambani built India's largest private sector company, Reliance India Limited, from a scratch. Over time his business has diversified into a core specialization in petrochemicals with additional interests in telecommunications, information technology, energy, power, retail, textiles, infrastructure services, capital markets, and logistics. 

Dhirubhai Ambani is credited with shaping India's equity culture, attracting millions of retail investors in a market till then dominated by financial institutions. Dhirubhai revolutionized capital markets. From nothing, he generated billions of rupees in wealth for those who put their trust in his companies. His efforts helped create an 'equity cult' in the Indian capital market. With innovative instruments like the convertible debenture, Reliance quickly became a favorite of the stock market in the 1980s. In 1992, Reliance became the first Indian company to raise money in global markets, its high credit-taking in international markets limited only by India's sovereign rating. Reliance also became the first Indian company to feature in Forbes 500 list. 


Dhirubhai Ambani was named the Indian Entrepreneur of the 20th Century by the Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry (FICCI). A poll conducted by The Times of India in 2000 voted him "greatest creator of wealth in the century". 

Dhirubhai Ambani died on July 6, 2002,


Saturday, February 18, 2017

Jamshedji Tata



  • पूरा नाम    –  जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा
  • जन्म        – 3 मार्च 1839
  • जन्मस्थान –  नवसेरी
  • पिता        –  नुसीरवानजी टाटा
  • माता        –  जीवनबाई टाटा
  • पत्नी –  हीराबाई दबू ( Jamshedji Tata Wife )

Jamshedji Tata – जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा भारत के पहले उद्योगपति थे जिन्होंने भारत की सबसे बड़ी मिश्र कंपनी टाटा ग्रुप की स्थापना की थी। उनका जन्म गुजरात के नवसारी नाम के छोटे कस्बे में पारसी पादरियों के परिवार में हुआ था। और बाद में उन्होंने ही टाटा ग्रुप ऑफ़ कंपनी की स्थापना की। टाटा को भारत में “भारतीय उद्योग का जनक” कहा जाता है।
उनका जन्म जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा के नाम से 3 मार्च 1839 को हुआ था। जमशेदजी टाटा नुसीरवानजी टाटा के बेटे थे। पारसी परिवार के वे अकेले ऐसे उद्योगपति थे जो पारसी परिवार के पादरी समुदाय में अपनी पत्नी जीवनबाई टाटा के साथ रहते थे। बाद में नुसीरवानजी टाटा उद्योग में अपनी रूचि को देखते हुए अपने परिवार के साथ उद्योग करने बॉम्बे चले गए। बॉम्बे में उन्होंने एक छोटे व्यापार से शुरुवात की लेकिन कभी उन्हीने छोटा व्यापार करते हुए हार नही मानी। जमशेदजी टाटा ने एलफिंस्टन कॉलेज, बॉम्बे से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया, जहा वे अपने कॉलेज में एक होनहार विद्यार्थी के नाम से जाने जाते थे और उनकी बुद्धिमत्ता को देखते हुए प्रिंसिपल ने डिग्री खत्म होने पर जमशेदजी की पुरी फीस लौटाने का निर्णय लिया। जमशेदजी टाटा ने 14 साल की अल्पायु में ही व्यापार करना शुरू किया, उस समय वे व्यापार के साथ-साथ पढाई भी कर रहे थे। उस समय बाल विवाह की प्रथा काफी प्रचलित थी उसी को देखते हुए भविष्य के महान उद्योगपति जमशेदजी ने 16 साल की आयु में 10 साल की हीराबाई दबू से विवाह कर लिया। 1858 में वे कॉलेज से ग्रेजुएट हुए और अपने पिता की ही व्यापारी संस्था में शामिल हो गए। 1857 का ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध का विद्रोह उस समय नया ही था तो टाटा ने ऐसी परिस्थिति में ही अपने व्यापार को शिखर पर ले जाने की ठानी।
व्यक्तिगत जीवन 
उनके बेटे दोराबजी टाटा और रतनजी टाटा को भी टाटा ग्रुप के अध्यक्ष के रूप में सफलता मिली।
टाटा की बहन जेराबाई, ने मुम्बई के ही एक व्यापारी से विवाह कर लिया और शापुरजी सक्लटवाला की माता बनी। शापुरजी सफलता पुर्वक बिहार और उड़ीसा में टाटा ग्रुप के कोयला और लोहा अयस्क व्यापार की देखभाल कर रहे थे। बाद में शापुरजी टाटा का मेनचेस्टर का कार्यालय सँभालने हेतु इंग्लैंड चले गये और बाद में ब्रिटिश संसद के साम्यवादी सदस्य चुने गये।
एक उद्योगपति की तरह पहचान
भले ही 14 साल की आयु में जमशेदजी टाटा / Jamshedji Tata ने अपने व्यवसाय को शुरू किया हो लेकिन वे अपना पूरा योगदान 1858 में अपने ग्रेजुएशन के बाद से ही दे पाये थे। 1858 से वे अपने पिता के हर काम में सहयोगी होते थे, उन्होंने उस समय अपने व्यवसाय को शिखर पर ले जाने की ठानी जिस समय 1857 के विद्रोह के कारण भारत में उद्योग जगत ज्यादा विकसित नही था। 1857 का मुख्य उद्देश् भारत में ब्रिटिश राज को खत्म करना और भारत को आज़ादी दिलाना ही था। फिर भी 1859 में नुसीरवानजी ने अपने बेटे को होन्ग कोंग की यात्रा पर भेजा, ताकि वे अपने बेटे की उद्योग क्षेत्र में रूचि बढ़ा सके, और उनके पिता की इस इच्छा को जमशेदजी ने बखुबी निभाया। और अगले चार सालो तक जमशेदजी होन्ग कोंग में ही रहे, और वे अपने पिता की ख्वाईश वहा टाटा ग्रुप ऑफ़ कंपनी का कार्यालय खोलने की सोचने लगे। होन्ग कोंग में टाटा & कंपनी के ऑफिस की स्थापना टाटा साम्राज्य के विस्तार को लेकर एशिया में टाटा & सन्स द्वारा लिया गया ये पहला कदम था। और 1863 से टाटा कार्यालय सिर्फ हॉन्गकॉन्ग में ही नही बल्कि जापान और चीन में भी स्थापित किये गये। एशिया में अपने उद्योग में विशाल सफलता हासिल करने के बाद जमशेदजी टाटा युरोप की यात्रा पर गए। लेकिन वहा उन्हें शुरुवात में ही असफलता का सामना करना पड़ा। एशिया की तरह युरोप में वे शुरू में सफल नही हो सके। इसीलिए पहले जमशेदजी ने इंग्लैंड जाकर अपने पिता के संबंधियो को बढ़ाने की ठानी, ताकि वे लंदन में भारतीय बैंक स्थापित कर सके। लेकिन टाटा का यह निर्णय उनके लिए बहोत गलत साबित हुआ, क्योकि भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए यह सही समय नही था और जिस समय टाटा ने यह निर्णय लिया था उस समय भारत आर्थिक कमजोरियों से होकर गुजर रहा था। इसका सीधा असर टाटा के व्यवसाय पर पड़ा, और टाटा ग्रुप को बड़ी असफलता का सामना करना पड़ा। उस समय सिर्फ भारत में ही नही बल्कि पुरे एशिया में टाटा ग्रुप & कंपनी को भारी नुकसान झेलना पड़ा। इन सब के पीछे विदेश में भारतीय बैंक को स्थापित करने में असफल होना ही था। बाद में 29 साल की आयु तक जमशेदजी ने अपने पिता का ही साथ दिया और अपने पिता के साथ काम करने लगे, बाद में उन्होंने खुद की एक व्यापारी कंपनी खोली। ये 1868 की बात है, की जमशेदजी ने खुद की बहोत सी कॉटन मीलो की स्थापना की। टाटा की मीलो का यह साम्राज्य 1874 में नागपुर में स्थापित किया गया जहा जमशेदजी टाटा ने काफी पैसे कमाये। महाराणी व्हिक्टोरिया जब भारत की महारानी बनी थी तो उसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपनी मील का नाम रखा था। नागपुर की उन मीलो से टाटा ग्रुप ने बहोत कमाई की लेकिन वही मील बाद में जमशेदजी ने बहोत बड़ी कीमत में बेच दी थी। जमशेदजी टाटा की कॉटन मील में उत्पादित किये हुए कपडे सिर्फ भारत में ही उपयोग नही किये जाते बल्कि उन्हें विदेशो में निर्यात भी किया जाता है। जिनमे जापान, कोरिया, चीन और मध्य-पूर्व के कई देश शामिल थे। जमशेदजी टाटा की उस कॉटन मील का मुख्य उद्देश् सिर्फ और सिर्फ लोगो को अच्छी गुणवत्ता प्रदान करके उन्हें समाधानी करना था। जिसका फायदा पुरे टाटा उद्योग को मिला। उनकी मिल को पहले धर्मसि कॉटन मील और बाद में स्वदेशी कॉटन मील कहा जाता था, जिसका लोगो के दिमाग पर काफी असर पड़ा। और लोग सिर्फ भारतीय वस्तुओ का ही उपयोग करने लगे। और ब्रिटिश वस्तुओ का त्याग करने लगे। तब से लेके आज तक जमशेदजी का मुख्य उद्देश् देशी वस्तुओ को बढावा देना ही है। इसी वजह से आज टाटा & सन्स भारत की सबसे प्रचलित कंपनी बन गयी है। टाटा कंपनी अपने उत्पाद के साथ ही सबसे अच्छा काम करने का वातावरण प्रदान करने वाली कंपनी के रूप में भी जानी जाती है। कहा जाता है की टाटा ग्रुप ऑफ़ कंपनी अपने कामगारों को अच्छी से अच्छी सेवाएँ प्रदान करती है। जिस समय लोगो को स्वास्थ और चिकित्सा और यातायात सेवाओ के बारे में पता भी नही था उस समय जमशेदजी अपने कामगारों को ये सुविधाये प्रदान करते थे।
उन्होंने कामगारों को ही नही बल्कि उनके बच्चों को भी अच्छी सेवाएं प्रदान की, और एक्सीडेंट मुआवजा, पेंशन जैसी सुविधाये प्रदान की। वे अपने कामगारों को काम का प्रशिक्षण भी दिया करते थे। वो जमशेदजी टाटा ही थे जिन्होंने जापानीज स्टीम नेविगेशन कंपनी को मालभाड़ा कम करने की अपील की थी। क्योकि मालभाड़े का सबसे ज्यादा प्रभाव जमशेदजी की कमाई पर होता था।
उनकी इस अपील का फायदा सिर्फ टाटा ग्रुप को ही नही बल्कि पुरे देश को हुआ। जमशेदजी ने उनकी विरुद्ध केस दाखिल भी किया और अपने खुद के पैसो से उठा केस को लड़ने लगे, और अंत में उन्हें सफलता मिली और कोर्ट ने उनकी अपील को मानते हुए मालभाड़े में कमी की। कोर्ट के इस निर्णय से भारतीय व्यापारियो को काफी मुनाफा हुआ।
अंततः 19 मई 1904 को जमशेदजी टाटा ने अंतिम सांस ली। और आज वे पुरे भारतीय उद्योग जगत के प्रेरणास्त्रोत है। आज टाटा ग्रुप ऑफ़ कंपनी भारत ही नही बल्कि पुरे विश्व की सबसे बड़ी कंपनी के रूप में जानी जाती है।
एक नजर में जमशेदजी टाटा का जीवन परिचय – Jamshedji Tata life timeline
1) 1839 – 3 मार्च को जमशेदजी टाटा का जन्म हुआ।
2) 1853 – हीराबाई दबू से उनका विवाह हुआ।
3) 1858 – अपने पिता के व्यवसाय में शामिल हुए।
4) 1868 – स्वयं की कंपनी स्थापित की।
5) 1874 – महारानी मील की स्थापना की।
6) 1901 – यूरोप और अमेरिका की यात्रा की, ताकि स्टील की शिक्षा प्राप्त कर सके।
7) 1903 – ताज महल होटल की स्थापना की।
8) 1904 – 19 मई को देहवास हुआ।

“जब आप अपनी क्रिया और सोच में बढ़ोतरी करते हो – तो जरुरी नही के आपकी बढ़ोतरी आपके विचारो से मेल खाये – एक सच्ची हिम्मत, भौतिक या मानसिक या आध्यात्मिक भी हो सकती है। फिर चाहे आप इसे जो भी नाम दो, इस तरह से आपको मिलने वाली हिम्मत और दृष्टी वही होंगी जो हमें जमशेदजी टाटा / JAMSHEDJI TATA ने दिखाई थी। ये सही है की हम उनकी याद में उनका सम्मान करे और एक आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में उन्हें याद करे।”

जमशेदजी टाटा, भारत के सबसे बड़े उद्योग समुह टाटा के संस्थापक थे। उन्होंने अपनी कुशलता से विशाल टाटा साम्राज्य देश ही नहीं बल्कि विदेशो में भी स्थापित किया। उन्होंने अपनी कुशलता के बल पर आज टाटा ग्रुप & कंपनी को शिखर पर पहोचाया और दुनिया में एक नयी पहचान दिलाई। जमशेदजी टाटा भारत के प्रथम महान उद्योगपतियों में से एक माने जाते है। आज उन्ही के योगदानो की वजह से भारतीय उद्योग को विदेश में पहचान मिल पाई। जिस समय भारत आर्थिक संकटो से जूझ रहा था उस समय उन्होंने चपलता से टाटा ग्रुप & कंपनी की नीव रखी, और उसमे सफल भी हुए। उनका हमेशा से ही यह मानना था की हम कभी भी सीधे कोई बड़ा काम नही कर सकते, कोई भी बड़ा काम करने के लिए पहले छोटे-छोटे काम करने की जरुरत होती है।